
रक्षाबंधन का पर्व हो और बहन भाई साथ न हों तो कैसा लगता है ? यह प्रश्न किसी ऐसे ही अभागे से पूछ लिया जाए तो निश्चय ही उसका दर्द आखों के रास्ते छलक आता है ।…..कुछ कार्यवश आज बबुरी थाने पहुंचा था । महिला हेल्प डेस्क में बैठी वर्दी धारी महिला कांस्टेबल बबिता को देखा तो मन में कौतूहल उठने लगा कि जिस त्यौहार का हर बहन को इन्तजार रहता है , उस दिन भी यह वर्दी पहने ड्यूटी निभा रही है , इसे कैसा अनुभव हो रहा होगा ? जानना चाहिए । क्योंकि अमूमन इस त्यौहार पर बहनों की विशेष तैयारी होती है । मेहंदी, नये कपड़े, साज श्रृंगार, राखी बांधने के बदले मिलने वाले गिफ्ट को लेकर लालसा होती है।……फिर सोचा अपने मन में उठी जिज्ञासा को मार दूं , मुझसे क्या मतलब है । लड़की है तो दुख तो होगा ही , यह सोच कर मैं कार्यालय की ओर बढ गया । लेकिन कंधे पर राइफल टाँगे ड्यूटी बजाती एक और महिला कांस्टेबल रागिनी यादव को देखा तो कदम ठिठक गए ।
सोचने लगा कि आज के पहले मैने केवल महसूस किया था, पुलिस का कोई त्यौहार नहीं होता । बेचारे अपने बीवी, बच्चों से दूर दूसरों के त्यौहार सुखमय बिते इस लिए कभी दुर्गा-पूजा तो कभी होली, तो कभी दीपावली में ड्यूटी निभाते मिल जाते हैं। इनका कोई रविवार नही होता । ये दूसरों के त्यौहार मनाते परिवार देख अपने मन को मना लेते हैं , लेकिन आज वास्तव में सामना हो गया। पहले सोचता था, क्या होली खेलते बच्चों मे इन्हें अपने बच्चे नही दिखते होंगे ? दीपावली के दिन पटाखे फोड़ते बच्चों की खिलखिलाहट अपने बच्चों की यादें नही दिलाती होंगी ? जरूर दिलाती होंगी ,लेकिन पुरूष हैं इस लिए कठोर हैं, पेट के लिए परिस्थितियों से तालमेल बैठा लेते हैं । शायद कोई महिला होती तो ऐसी ड्यूटी को ठोकर मार देती । लेकिन मैं गलत था । करीब बीस से पचीस साल की दो लड़कियाँ रक्षा बंधन जैसे त्यौहार पर थाने पर ड्यूटी कर रही थी ।…..मैं चाह कर भी अपने को रोक नही पाया , मैने आखिर बबिता राय से पूछ ही लिया “आप कितने भाई बहन हैं?” जवाब मिला “एक भाई दो बहन ” ” आज रक्षाबंधन है और आप ड्यूटी पर हैं, भाई को राखी नहीं बांधने गयीं? ” “नहीं ! ड्यूटी थी , इसलिए नही जा पाई ” “भाई से बात हुई थी ?” “हाँ । पूछ रहा था दीदी आओगी कि नहीं ” ” क्या कहा आपने?” ” क्या कहती , बोली कि छोटी से राखी बंधवा लो, छुट्टी मिली होती तो जरूर आती ।” ” फिर तो आपने भाई को बहुत मिस किया होगा ?” ” आज के दिन भाई से दूर हो तो कौन बहन मिस नहीं करेगी सर ? नौकरी से पहले नहीं सोचा था ऐसा होगा । पर कोई बात नहीं, भाई की कलाई सूनी रही तो क्या, मैने आज थाने के एस.ओ. और ए. एसपी. को राखी बांधी । थाने के कई और भाइयों ने भी राखी बधवाई । मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैने एक भाई को छोड़ा तो कई भाई पा लिए । वास्तव में थाने के सभी लोगों का मुझे बहुत प्यार मिला है ”

इसी क्रम में मैने रागिनी यादव से भी जानने की कोशिश की तो उनकी आँखे भर आईं । थोड़ा संयत हुई तो बताया कि ” मेरा भाई शुभम छोटा है । जिद कर रहा था ‘दीदी आओ ! ‘। बहुत समझाया तब जाकर माना ।….मिस तो बहुत की पर ड्यूटी भी तो जरूरी है । इसलिए मन को मना लिया ।”

दोनों महिला कांस्टेबल से बात करने के बाद लगा कि जिम्मेदारिया लोगों को समझदार बना देती हैं । जो लड़कियां इस उम्र में सजने सवरने, घूमने फिरने , अपनी जिद मनवाने के लिए पापा के आगे जिद करती हैैं, आज वही लड़कियां समझदार हो गयी हैं। आज फिर से मैने भारतीय पुलिस को दिल से सैल्यूट किया । सहनशीलता की मूर्ति के रूप में दोनो सिपाहियों ने खुद को स्थापित कर लिया था । अब तक पुरूष पुलिसकर्मियो की त्यौहारों पर तैनाती देखा करते थे, आज महिलाओं का भी समाज के प्रति समर्पण देखने को मिला ।
कई बार पुलिस की कार्य प्रणाली पर हम निराधार आरोप भी लगा देते हैं । एक आम जन मानस की नजर में पुलिस मतलब “वर्दी वाला गुण्डा” होता है । लेकिन हमे अपनी सोच बदलने की जरूरत है, पुलिस वास्तव में हमारे सुरक्षा के लिए ही बनी है । मैने अपने पत्रकारिता जीवन में कई ऐसे वाकयात देखे हैं जब पुलिसकर्मियों ने अपनी परवाह किए बगैर जान जोखिम में डाल दिया है । यदि कुछ अपवाद पुलिसकर्मियो को छोड़ दिया जाय तो वास्तव में पुलिस त्याग की प्रतिमूर्ति होती है । जो समाज के लिए हर मौके पर एक मजबूत सुरक्षा ढाल की तरह होती है और हर त्यौहार पर अपने परिवार से दूर हमारे परिवार की सुरक्षा के लिए तैनात होती है ।
