
चंदौली । जनप्रतिनिधियों द्वारा आएदिन पत्रकारों पर फर्जी केस मढे जाने का सिलसिला नया नही है । सत्ता के नशे में चूर प्रतिनिधि पत्रकारों के अधिकारों का हनन लगातार करते आ रहे हैं । इस समय चंदौली जिले में चकिया विधान सभा के विधायक शारदा प्रसाद द्वारा दो पत्रकारो पर मढे गये एस सी एस टी ऐक्ट के तहत केस की चर्चा जोरो पर है । पत्रकार भारी संख्या में धरना दे रहे हैं, पत्रकार की रिहाई की मांग कर रहे हैं लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा का दम भरने वाली उत्तर प्रदेश सरकार और उनके मातहतों पर कोई प्रभाव नही पड रहा है ।
दशा ये है कि अब कलमकार सच लिखने से भी डरने लगे हैं । एक तरफ सरकार पत्रकारों के सुरक्षा का दावा करती है तो दूसरी तरफ उसी सरकार के विधायक पत्रकारो पर झूठे केस मढ रहे हैं । इसपर पत्रकारों के आन्दोलन करने के बावजूद विधायक का तेवर कम नही हुआ है। एक चैनल को दिए गए इन्टरव्यू में विधायक शारदा प्रसाद दूसरे पत्रकारों पर भी मुकदमा दर्ज कराने की खुलेआम धमकी दे रहे हैं और सरकार अपने कानों में तेल डाले पड़ी है ।

वैसे सरकार के साथ ही पत्रकारो का एक विशेष वर्ग भी इन पत्रकारों के प्रति उदासीनता अपनाए हुए है । यहां जिन पत्रकारों की बात की जा रही है वे ऐसे पत्रकार हैं जो न्यूज पोर्टल के लिए समाचार संकलन करने वाले पत्रकारों को पत्रकार मानते ही नहीं । इस प्रकरण की प्रकाशित खबरों मे आपने इन पत्रकारों के लिए एक विशेषण पढा होगा ” पोर्टल के पत्रकार ” । ये शब्द उन पत्रकारों के मानसिकता का परिचायक है । आज तक किसी अखबार या न्यूज चैनल के रिपोर्टर को केवल पत्रकार ही नाम से जाना जाता था । लेकिन अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करने मे कहीं न कही लोगो ने अपनी जीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है । वास्तव में पत्रकार शब्द किसी प्रिन्ट मीडिया के संवाददाता के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके शब्दों पर ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट होता है पत्र + कार , मतलब पत्र लेखन करने वाला। यहा पत्र से तात्पर्य “समाचार पत्र” से है । टेलीविजन के चलन के बाद समाचार के एक सशक्त माध्यम के रूप में टीवी ने आधुनिक समाज में अपनी पैठ बना ली । लेकिन टीवी चैनल के लिए समाचार संकलन करने वालो के लिए कोई नया शब्द नही गढ़ा गया । उन्हें भी पत्रकार ही कहा गया । मै यहा स्पष्ट करना चाहूँगा कि अक्सर खबरों मे किसी पत्रकार के बारे मे समाचार लिखते हुए यही प्रकाशित किया जाता है “एक टीवी चैनल के पत्रकार या एक समाचार पत्र के पत्रकार” इस हिसाब से “एक पोर्टल का पत्रकार” लिखे जाने में कोई हर्ज़ नही है । लेकिन किसी दूषित मानसिकता के वशीभूत होकर प्रिन्ट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों से ‘अलग व तुच्छ’ दिखाने की नियत से पोर्टल के पत्रकार लिखना गलत है । तो यहां शोसल मीडिया के पत्रकारों को भी पत्रकारिता की गरिमा समझने की जरूरत है । आसानी से पत्रकार का तगमा मिल जाने पर “अहम ब्रह्मसि” के भाव में नही आना चाहिए । पत्रकारिता एक पवित्र पेशा है, इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए चाटुकारिता से दूर रहने की जरूरत होती है । आजकल लोगो मे ” बिकाऊ मीडिया ” का दृष्टिकोण पनपने का कारण कहीं न कही पत्रकारिता के दूषित होने के कारण ही है ।
भुक्तभोगी पत्रकार कार्तिकेय पाण्डेय 
चंदौली के पत्रकारों के बीच आजकल एक चर्चा और है । सूचना प्रसारित करने के लिए विभागीय तौर पर बने ह्वाट्सेप ग्रुप से शोसल मीडिया के पत्रकार निकाले जा रहे हैं । किसी सरकारी दफ्तर में पत्रकारों मे भेद करने का साहस पनपना कहीं न कहीं पत्रकारिता के ‘जयचंदो’ की बदौलत ही है । शोसल मीडिया पर किसी खबर के कुछ समय बाद ही प्रसारित होने के कारण कहीं न कहीं रात मे टीवी पर या अगले दिन अखबारो मे छपने वाले खबर की महत्ता कम हो जाती है । आजकल ज्यादातर लोग समय के अभाव के चलते शोसल मीडिया पर भी समाचारो के लिए निर्भर रहने लगे हैं । इसी लिए लगभग सभी बड़े समाचार पत्र तथा चैनल अपने शोसल प्लेटफॉर्म भी विकसित कर रखे हैं । पर स्थानीय तौर पर ऊर्जावान लोगो द्वारा संचालित होने वाले ये शोसल मीडिया पटल अपने खबरों के कवरेज व त्वरित प्रसारण के कारण दूसरे मीडिया माध्यमों के लिए जंजाल बने हुए हैं । इसी लिए “ब्रान्डेड पत्रकारो” के मन मे शोसल मीडिया के पत्रकारों के लिए वैमनस्यता उपजती जा रही है ।
वास्तव में यह समय अपने सहकर्मी पत्रकार साथियों के हक हकूक के लिए एक साथ लड़ने की है । सभी मीडिया माध्यमों को किसी पत्रकार के उत्पीड़न पर एक हो जाना चाहिए । न कि वह ‘छोटा पत्रकार है , यह बड़ा पत्रकार है’ ऐसा दृष्टिकोण बनाना चाहिए । अगर हम समय रहते नही चेते तो कभी न कभी षड्यंत्र का शिकार होकर यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भरभरा कर गिर जाएगा ।
