

राष्ट्र संदेश की श्रावण मास श्रृंखला “कण कण में शिव” में आप का स्वागत है । इस सोमवार हम आप को दर्शन करा रहे हैं मिर्जापुर जनपद के जमालपुर विकास खण्ड स्थित पसही गांव के स्वयंभू भगवान तारकेश्वर नाथ महादेव की । चंदौली जनपद के बबुरी बस स्टैंड से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह शिव मंदिर अपने महात्म्य के लिए प्रसिद्ध है ।
चंदौली जनपद से सटे मिर्जापुर क्षेत्र के पसही गाव स्थित सैकड़ो वर्ष पुराना यह शिवालय पूरे साल भक्तों से भरा रहता है । यहां आने के लिए भक्त सोमवार, सावन मास या शिवरात्रि पर्व का इन्तजार नहीं करते । कहते हैं इनकी सेवा करने वाले परिवार को बड़ी से बड़ी विपत्ति भी नुकसान नहीं पहुंचा पाती है ।
पसही गाव के वयोवृद्ध बताते हैं कि इस मंदिर की उत्पत्ति कब हुई, कोई भी सटिक नहीं बता पाता , क्योंकि कई पुश्तो से लोग बाबा को उसी स्थान पर विराजमान देख रहे हैं । गांव के लोग पुरनियो से बाबा तारकेश्वर नाथ की उत्पत्ति की कथाए सुना करते थे , जिनके कारण बाबा मे आस्था उन्हें पारंपरिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती रही । बाबा तारकेश्वर नाथ की उत्पत्ति को लेकर गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि सैकड़ों साल पहले इसी स्थान से बहने वाली चन्द्रप्रभा नदी के पास एक छोटा सा गांव बसता था । गांव के लोग सिंचाई से लेकर दैनिक दिनचर्या मे प्रयोग तक के लिए इस नदी के पानी पर आश्रित थे ।

नदी जब बहाव में होती तब तक तो सब ठीक चलता था , लेकिन जब गर्मियों में नदी से पानी उतरने लगता तो गाव के लोगों को पीने तक की पानी के लिए परेशानी होने लगती थी । इस समस्या से निजात पाने के लिए गांव के लोगों ने नदी के पास ही एक कुआं खोदने का विचार बनाया । तय समय पर लोगों ने काम भी शुरू कर दिया । गांव के कुछ लोगों का दल फावड़े के साथ कुएं के निर्माण के लिए मेहनत करने लगा । गड्ढा खोदते खोदते गहराई में पहुचने पर लोगों को नमी युक्त मिट्टी मिलने लगी , खुदाई कर रहे लोगों को आशा जगी कि अब मेहनत के सफल होने का समय आ गया है, कुछ ही फावडो का चोट जमीन खोद कर पानी बाहर कर देगी । ग्रामीणों के हाथ दोगुने उत्साह के साथ चलने लगे । एकाएक एक फावड़े की चोट पर पत्थर से टकराने की आवाज आई और आसपास की मिट्टी गिली होने लगी । ग्रामीण पानी की आशा मे कौतूहल के साथ गिली हो रही मिट्टी को निहारने लगे, लेकिन उनका कौतूहल चंद क्षणों में ही अचरज में बदल गया, क्योंकि गिली होती मिट्टी से पानी की जगह दूध की धारा फूट पड़ी थी । देखते ही देखते कुआं दूध से भरने लगा । किसी तरह डरे सहमे ग्रामीण अपनी जान बचाकर बाहर निकल आए । कुआ दूध से लबालब भर गया ।

अनहोनी की आशंका से डरे लोगों ने इस घटना की जानकारी एक सिद्धी प्राप्त सन्त को दी । जानकारी मिलते ही संत की आँखे चौड़ी हो गयी, वे जैसे थे वैसे ही गाव के लिए चल पड़़े। कुए केे स्थान पर पहुच कर उन्होंने भगवान को साष्टांग प्रणाम किया और प्रार्थना करने लगे । धीरे धीरे कुए से दूध की मात्रा घटने लगी । देखते ही देखते कुआं पूरी तरह सूख गया । ग्रामीणों की भीड़ ने कुएं में झाँका तो और भी आश्चर्य से भर उठे । कुएं के बीच भगवान शिव का विशाल शिवलिंग अवतरित हो चुका था । संत के निर्देशन में ग्रामीणों ने भगवान शिव को कुएं से बाहर निकाल कर कुएं को पाट दिया तथा उसी स्थान पर भगवान शिव के शिवलिंग को स्थापित कर दिया । लोगो ने अपनी आस्था के अनुसार भगवान शिव का नामकरण तारकेश्वर महादेव के रूप में कर दिया । धीरे धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गयी ।

वर्षों तक अपने मूल रूप में पूजे जाने के बाद सन् 1928 में गाव के दुुुक्खीराम पाण्डेय (स्वर्गीय) ने ग्रामीणों के सहयोग से उक्त स्थान पर मंदिर का निर्माण करा दिया । तब से लेकर आज तक हर वर्ष महाशिवरात्रि पर पसही गाव स्थित इस भव्य शिवालय पर श्रध्दालु जनों की भारी भीड़ जुटती है। यहां इस अवसर पर एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है । तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में हजारों की संख्या में पहुच कर भक्त भगवान तारकेश्वर का जलाभिषेक करते हैं । पूरे सावन मास में मंदिर परिसर आस्थावनो से पटा रहता है । मंदिर परिसर वर्तमान समय मे अत्यंत रमणीय स्थल के रूप मे घने विशाल बरगद वृक्ष के नीचे विद्यमान है । शिव मंदिर के पूर्व दिशा के द्वार के सामने चंद्रप्रभा नदी बहती है । आज भी भौगोलिक स्थिति देखने पर शिव मंदिर का गर्भ गृह नदी की सीमा में दिखाई देता है । आसपास खुदाई के दौरान कई विशाल पत्थरों की खण्डित प्रतिमाएं भी मिलीं हैं जो मंदिर परिसर में चबूतरों पर पूजी जाती हैं। कहते हैं इस शिव मंदिर में सच्ची श्रद्धा से मांगी गयी प्रत्येक मुराद पूरी होती है । मंदिर के सेवादार परिवार परिसर के आसपास ही निवास करते हैं । वे बताते हैं कि भगवान तारकेश्वर नाथ के दर्शन पूजन से परिवार पर दुख विपत्ति नही आती है। जो आती भी है वो भगवान शिव की कृपा से छण भर में समाप्त हो जाती हैं ।

