चंदौली की धरती पर बबुरी क्षेत्र ने इस बार फिर से बाढ़ का मंजर देखा। चंद्रप्रभा और गड़ई की उफनती लहरों ने गांवों को डुबो दिया। घर, मवेशी, खेत, सब जलमग्न हो गए। मैं उन दिनों लगातार बाढ़ पीड़ित गांवों में था। पानी में धंसी गलियां, छप्पर पर बैठे लोग और आंखों में असहायता का सैलाब—ये दृश्य किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर देने के लिए काफी थे।
इसी बीच एक ऐसा पल आया, जब मैंने देखा कि निराश ग्रामीणों की आंखों में अचानक उम्मीद की चमक लौट आई। यह तब हुआ जब मुगलसराय विधायक रमेश जायसवाल खुद पानी में उतरकर बाढ़ पीड़ितों के बीच पहुंचे। मैं उनके साथ ही था। घुटनों तक चढ़े पानी में उनका कदम–कदम बढ़ाना, हाथों से लोगों को सहारा देकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, राहत सामग्री खुद ग्रामीणों को सौंपना—यह सब कुछ मेरे लिए केवल खबर नहीं रहा, बल्कि दिल को छू लेने वाला अनुभव बन गया।
जहां लोग कई दिनों से राहत की बाट जोह रहे थे, वहां विधायक का पहुंचना किसी संजीवनी से कम नहीं था। गांव की औरतों की आंखें नम थीं, बुजुर्ग हाथ जोड़ धन्यवाद दे रहे थे और बच्चे उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।सबसे खास बात यह रही कि वे सिर्फ राहत बांटकर लौटे नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों को बार-बार निर्देशित करते रहे कि “किसी एक भी बाढ़ पीड़ित तक राहत पहुंचने से न छूटे। हर नुकसान का आकलन हो और मुआवजा हर हाल में दिया जाए।”
मैंने देखा कि वे बार-बार कागज पर नोट कर रहे थे कि किस गांव में कितनी जरूरत है। लगभग बीस गांवों में यह दृश्य मैंने अपनी आंखों से देखा, जहां वे बाढ़ के बीच सीधे ग्रामीणों के साथ खड़े नजर आए। पत्रकार होने के नाते मैंने कई बार नेताओं को मंच से वादे करते देखा है, लेकिन बाढ़ के पानी में उतरकर लोगों के बीच खड़ा होना एक अलग ही अनुभव था। यह केवल राजनीति नहीं थी, यह मानवता थी। जब रात को मैं राहत शिविर लौटा तो वहां बैठे ग्रामीणों के बीच एक ही चर्चा थी “हम अकेले नहीं हैं, हमारे बीच कोई है जो हमें डूबते गांवों से बाहर निकाल रहा है।” यह संस्मरण लिखते समय अब भी मेरे कानों में वही स्वर गूंज रहे हैं और आंखों के सामने वही दृश्य हैं। शायद यही कारण है कि बाढ़ के भयावह अनुभव के बीच भी मुझे यह लिखते हुए उम्मीद की एक रौशनी दिख रही है।
