विश्व के प्राचीनतम जीवित नगरों में से एक आध्यात्मिक एबं धार्मिक नगरी वाराणसी है। वाराणसी ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बियों के तीर्थ के रूप में सुबिख्यात रहा है | धर्मशास्त्रों में इसे कई नामों से जाना जाता है-वाराणसी, काशी, आनन्दकानन, अविमुक्त एवं महाश्मशान। हिन्दुओं के लिए यह नगर अटूट धार्मिक पवित्रता,पुण्य तथा विद्या का प्रतीक रहा है । वाराणसी  के विषय में कहावत है- ‘सात वार नौ त्योहार’। यानी सप्ताह के सात दिन में नौ त्योहार का पड़ना। इन त्योहारों तथा पर्वों का सम्बन्ध देवी पूजा, यक्ष पूजा,वृक्ष पूजा, कूप पूजा, नदी पूजा एबं देवताओं की पूजा से हैं ।
पुराणों एबं उपनिषदों के अनुशार वाराणसी नगर को महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदास ने पवित्र नदी गंगा के किनारे बसाया था | पुराणों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि काशी क्षेत्र में पग-पग पर तीर्थ हैं।
वाराणसी को मंदिरों, घाटों एबं कुंडो  का शहर भी कहा जाता है  क्योंकि यहां पर अनादिकाल से कई प्राचीन मंदिर  घाट एबं कुंड मौजूद है.ऐसा ही एक कुंड  काशी में मौजूद है जिसे ‘लोलार्क कुंड कहते है | पौराणिक कथाओं के अनुसार देवासुर संग्राम के दौरान भगवान सूर्य के रथ का पहिया इस जगह पर गिरा था, जिसके बाद यहां पर कुंड का निर्माण हुआ. इसी स्थान पर लोलार्क नाम के असुर का भगवान सूर्य ने वध किया था। यह भी कहा जाता है कि महाभारत काल में कुंती को कौमार्यावस्था में इसी स्थान पर सूर्य उपासना से ही दानवीर कर्ण जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई थी। लोलार्क कुंड का वर्णन महाभारत, स्कंदपुराण के काशी खंड में, शिव रहस्य, सूर्य पुराण और काशी दर्शन में विस्तार से किया गया है
काशी में उदय होने वाले सूर्य की पहली किरण इसी कुंड में पड़ती है | इस कुंड में श्रद्धा के साथ स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं, साथ ही संतान कामना की पूर्ति भी होती है
लोलार्क कुण्ड बनारस में तुलसीघाट के निकट भदैनी में स्थित है जो कि अति प्राचीन है तथा इस कुण्ड का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। कहा जाता है कि पांचों पांडवों ने और भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने भी यहीं इस कुंड पर स्नान किया था. सूर्य के बारह आदित्यों में से प्रथम लोलार्क आदित्य यहीं पर स्थापित है. यह भी कहा जाता है कि लोलार्क कुंड अंदर से गंगा नदी से भी जुड़ा हुआ है
लोलार्क कुंड को सूर्य कुंड के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद्र के शुक्ल पक्ष की षष्ठी वाले दिन कुंड से लगे कूप से पानी आता है। सूर्य की रश्मियों के पानी में पड़ने से संतान उत्पत्ति का योग बनता है। सन्तति की चाह रखने वाले निःसंतान दंपत्ति इस कुंड में यहां पर साथ साथ स्नान करते है | स्नान के समय महिलाये यहाँ पर अपने श्रृंगार आदि की सामग्री यही पर छोड़ जाती है । कुंड में स्नान के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा जाता ,इसके अलावा संतान की रक्षा के लिए भी महिलाएं इस कुंड में स्नान करती हैं . दंपती स्नान के बाद कुंड पर ही अपने अपने कपड़े और जूता-चप्पल छोड़ देते हैं और कुंड में कोई न कोई एक फल भी छोड़ देते हैं साथ ही किसी एक सब्जी का त्याग हमेशा के लिए कर देते हैं । फल छोड़ने से भगवान सूर्य की कृपा होती है. जिस फल को यहां पर छोड़ा जाता है, उसे खाया नहीं जाता क्योंकि मान्यताओं के अनुसार फल को छोड़ने से संतान की प्राप्ति होती है. लोलार्क कुंड में संन्यासी लोग भी  मोक्ष के लिए स्नान करते हैं।
काशीखंड ,शिव्महपुराण ,विष्णुपुराण कई सनातनी शाश्त्रों और धर्मग्रंथों में लोलार्ककुंड का उल्लेख मिलता है| लोलार्क कुंड की रचना इस प्रकार की तांत्रिक विधि से की गई है कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी  को सूर्य की किरणें अत्यंत प्रभावी बन जाती है। कालांतर में इस कुण्ड का जीर्णोद्धार महारानी अहिल्या बाई होलकर,अमृत राव और कूंच विहार स्टेट के महाराज ने करवाया था |
अपनी चमत्कारिक शक्तियों के कारण यह कुंड पूरे देश में प्रसिद्ध है। यही कारण है कि संतान प्राप्ति की इच्छा लिए ललई षष्ठी पर यहाँ पूरे हिंदुस्तान यहाँ तक की बिदेशो से लाखो लोग आते है एबं इस कुंड में डुबकी लगाते है 
एक अन्य मान्यतानुसार अगहन मास के किसी आदित्यवार को सप्तमी अथवा षष्ठी तिथि को लोलार्क की वार्षिक यात्रा करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो सकता है तथा वह श्रद्धालु जो असिसंगम पर स्नान कर पितर और देवताओं का तर्पण तथा श्राद्ध करता है, वह पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। माघ मास की शुक्ल सप्तमी के दिन गंगा और असि के संगम पर लोलार्क कुण्ड में स्नान करने से मनुष्य अपने सात जन्म के संचित पापों से मुक्त हो जाता है।

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By AVP

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