जिवित्पुत्रिका व्रत, जिसे लोकभाषा में जीवतिया, जीवित्पुत्रिका, जिउतिया आदि नामों से भी जाना जाता है, भारत के पूर्वी राज्यों—विशेषकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र—में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएँ अपने पुत्रों की लंबी आयु, स्वस्थ जीवन और सुख-समृद्धि की कामना से करती हैं। इसका पालन भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है।

❖ व्रत का उद्देश्य

जिवित्पुत्रिका व्रत का प्रमुख उद्देश्य है—

पुत्र की दीर्घायु की प्रार्थना करना,

रोग और संकटों से उसकी रक्षा करना,

परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि लाना।

यह व्रत मातृत्व, त्याग, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इसमें माताएँ कठोर उपवास रखती हैं और दिनभर बिना अन्न जल ग्रहण किए पूजा करती हैं।

❖ व्रत की तैयारी

व्रत से पहले महिलाएँ पूरे घर की सफाई करती हैं, पूजा का स्थान सजाती हैं और आवश्यक सामग्री जैसे—कच्चा धान, मिट्टी की प्रतिमा, फल, जल, दूर्वा, हल्दी, रोली आदि एकत्र करती हैं। व्रत से एक दिन पहले कुछ महिलाएँ अन्न का त्याग कर साधना में मन लगाती हैं।

❖ पूजा विधि

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।

मिट्टी से जिउतिया माता या किसी प्रतीक स्वरूप की प्रतिमा बनाई जाती है।

जल, फल, दूर्वा, सिंदूर, फूल आदि अर्पित कर पूजा की जाती है।

जिवित्पुत्रिका की कथा सुनना या सुनाना विशेष माना जाता है।

पूजा में व्रती माताएँ अपने पुत्रों के नाम लेकर लंबी आयु की कामना करती हैं।

रात्रि में जागरण कर कथा, भजन और व्रत से जुड़े गीत गाए जाते हैं।

❖ व्रत का पारंपरिक रूप

कई स्थानों पर माताएँ तीन दिन का व्रत करती हैं:

1. नहाय-खाय – पहले दिन शुद्ध भोजन कर व्रत की शुरुआत।

2. खरना – दूसरे दिन फलाहार कर उपवास।

3. जिउतिया – तीसरे दिन निर्जला व्रत रखकर पूजा।

व्रत के अंत में अगले दिन पारण कर व्रत पूरा किया जाता है।

❖ लोककथाएँ और विश्वास

इस व्रत से जुड़ी अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। इनमें जिउतिया माता की कृपा से पुत्र की रक्षा और संकटों से मुक्ति की बात कही जाती है। माताएँ विश्वास करती हैं कि इस व्रत से न केवल पुत्र सुरक्षित रहता है, बल्कि परिवार में सुख और समृद्धि भी बनी रहती है।

❖ सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

यह व्रत मातृत्व और परिवार की एकजुटता का प्रतीक है।

महिलाएँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं, मिलकर कथा सुनती हैं और पूजा करती हैं।

लोकगीतों, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का यह एक माध्यम है।

❖ निष्कर्ष

जिवित्पुत्रिका व्रत केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि मातृत्व, समर्पण और विश्वास की गाथा है। यह व्रत हमें त्याग, प्रेम और परिवार के महत्व का संदेश देता है। पुत्र की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए माताएँ जो तप और विश्वास करती हैं, वह इस व्रत की आत्मा है। इस पर्व के माध्यम से लोक परंपराएँ जीवित रहती हैं और समाज में सहयोग और स्नेह की भावना प्रबल होती है।

इस प्रकार जिवित्पुत्रिका व्रत भारतीय संस्कृति का एक अनुपम हिस्सा है, जो माताओं के असीम प्रेम और त्याग की भावना को उजागर करता है।

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By AVP

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