“का बिनोद ! बड़ा दिन बाद दिखाई दिए…….कहीं चले गये थे का ? डबुरी के लोग बड़ा याद कर रहे थे तुमको  ।”

“अरे नहीं भइया, इधर बरसात थोड़ा बढ़िया हुआ था तो चले गये थे खेत……रोपनी करने । “

“रोपनी ? इस टाइम रोपनी कौन करता है बिनोद ? अब तो सोहनी का टाइम चल रहा है । “

“नहीं भूषन भइया , हम तो रोपनी करके लौटे हैं ।”

“का बात कर रहे हो….देख रहा है मगरूआ ! बिनोदवा  सदेहय झूठ बोल रहा है ।…..कहाँ से सीख रहा है रे , इ सब ? “

“ही ही ही ही , डबुरी में बड़ा- बड़ा लोग झूठ बोल रहा है त हम भी थोड़ा कोशिश कर लिए , बुरा मत मानिएगा भूषन भइया । “

“डबुरी में कौन झूठ बोल रहा है बिनोद !” 

 “सुने नहीं हैं ?……. परधान जी कह रहे थे कि हम पत्तकारन से मांफी नहीं मांगे है । झुट्ठे हवा उडा है ।”

” हंअअअ ! माफी नहीं मांगे हैं !…..हम खुदै देखें हैं । बैठे हुए पत्रकारन के साथ । ओही जगह,  जहवां गरिआए थे….वही जाके माफी मांगे हैं .”

“का पता भैया,  कौनो अऊर बात कर रहे हों ।”

“का बात करता है बिनोद ! अभी चार दिन पहिले गरिया के, पचवे दिना परधान जी पत्रकारन के साथ ‘अक्का बक्का ‘ खेल रहे थे का ?……तुम नहीं जानते हो , इ जो झूठ बोला जा रहा है न , “पुष्पाराज” से ट्यूशन का असर है । रोज मिटिंग चल रहा था । “

“हं भइया । हमहूं सुने थे सलाहकार साहब बकरौधी छाट रहे थे कि केस दर्ज हो जाएगा तो परधान जी फांसी चढ़ जाएंगे का ? “

“का करोगे ! मूरख राजा का बकलोल बानर अंग रच्छक बना हुआ है  । पिछवाड़े पर बैठा मक्खी तलवार से हाक रहा है । ‘ राजा’ कौनो दिना गाँ# से हाथ धो बैठेंगे तब समझ में आएगा ।”

“हं त आप गजबे बोलते हैं भइया । हाथ से गाँ#  त सबै धोते हैं,  राजा गाँ# से हाथ धो बैठेंगे । ही ही ही….” 

“तब का !….. अब तुम्ही बताओ ! परसों के पहले अखबार में कितना रेलम पेल मचा हुआ था , एकाएक अइसा क्या हो गया की खबरय छपना बंद हो गया । “

“हं भइया ई बात तो है । “”अभी परसों दिना प्रधान जी पत्रकारों के साथ बैंठ कर  सेटलमेन्ट किए थे कि, जवन हो गया, तवन हो गया, अब से इ सब गलती नहीं दोहराएंगे । आज ट्यूशन लेेकर आए हैं तो अलगे राग अलाप रहे थे ।” 
“त अब आगे का होगा भइया ? “


“होगा का बिनोद ? परधान जब माफिए नहीं मांगे हैं तो पत्तकारन का जंग जारी रहेगा ।”


” पत्तकारन के जंग में त खाली कलमै चलता है भूषन भइया , परधान जी का का बिगड़ जाएगा ? फांसी थोडय चढेगे  !” 


“बिगड़ेगा बिनोद, बिगड़ेगा । पत्तकारन से उलझ के त आशाराम का बेड़ा गरक हो गया था फिर इ त परधानय हैं । देखना का होता है  !…..लाओ चुनौटी दो ।”


“हं इ लीजिये भइया ।……. थोड़ा बढ़ाई के बनाइएगा मगरूआ के लिए भी ।”  

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By AVP

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