Source: राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम एवं शब्दरंग साहित्य एवं कला संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यकार अनिल सक्सेना का सध्य प्रकाशित कहानी संग्रह “आख्यायिका” का लोकार्पण होटल मरुधर पैलेस में किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रखर विचारक- चिन्तक डॉ. उमाकांत गुप्त ने कहा कि इस संग्रह में चौबीस कहानियां है। संरचनात्मक स्तर पर कहानियों में भाषा ऋजुता लिए, तीखापन ओढ़े हुए प्रवाहात्मकता को लिए है। संग्रह की कहानियां कहीं कथानक को पकड़ कर नहीं बैठती अपितु आगे बढ़ने का मौक़ा देती हुई, बिना किसी द्वंद्व, उतार-चढ़ाव, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण-जाल से बचती हुई भाषा मूल्य चिंता को रचती है। यही संग्रह का मजबूत पक्ष है।

मुख्य अतिथि डॉ. अजय जोशी ने कहा कि कहानियां रंजन से चिंतन तक विकसित हुई है, फिर भी घटनात्मकता सदैव बरकरार रही है। यही इस संग्रह का उजला पक्ष है। विशिष्ट अतिथि राजेन्द्र जोशी ने कहा कि साहित्य की सबसे  लोकप्रिय विद्या कहानी है। साहित्य और विशेषकर लोक साहित्य को समृद्ध करने का काम कहानी विधा ने किया है। साहित्य की इस लोकप्रिय विधा  कहानी सुनना और कहने की कला हमारे यहाँ लोक में रही है। जीवन का यथार्थ चित्रण समकालीन कहानी की प्रमुख विशेषता है।

विशिष्ट अतिथि कथाकार राजाराम स्वर्णकार ने कहा कि “आख्यायिका” कहानी संग्रह की चौबीस कहानियों को पढ़ते हुए मन करता है कि हम इन्हें लगातार पढ़ते ही जाएं। आज कहानी सामाजिक सरोकार से गहरे तक जुडी है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, विकलांग विमर्श और मानवीय अस्तित्व कहानी के केंद्र में आ गए हैं।

कहानीकार अनिल सक्सेना ने आख्यायिका कहानी का वाचन करते हुए स्त्री पात्र “आख्यायिका” के जीवन संघर्ष को बताया। कार्यक्रम में पत्रकार अशोक माथुर, डॉ. रेणुका व्यास और डॉ. नासिर जैदी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सभी के प्रति आभार प्रेमनारायण व्यास ने ज्ञापित किया।

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By AVP

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