ग्राउंड रिपोर्ट

शहादत देने वाली सुखवंती की जगह आई नई बहू ने बच्चों को पालने से किया इनकार, मां सीता को भी नसीब नहीं हो रहा भोजन
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में दो बरस पहले 11 आदिवासियों के नरसंहार के बाद मिले मुआवजे ने कई आदिवासियों को अब खलनायक बना दिया है। सरकार और सियासी दलों की ओर से मिले भारी-भरकम मुआवजे ने ऐसी पटकथाएं लिखनी शुरू कर दी हैं जिससे इंसानियत शर्मशार हो रही है। आदिवासी बहुल उभ्भा गांव में हुई हिंसा में मारी गई एक महिला सुखवंती के पति रामनाथ पर जुल्म-ज्यादती के आरोप लगे हैं। आरोप किसी और ने नहीं, खुद मां ने लगाए हैं।उभ्भा गांव की सुखवंती तो खुद जीवन का सुख नहीं ले सकी, लेकिन उसके दोनों बच्चों की स्थिति अनाथों से भी बदतर हो गई है। आरोप है कि मुआवजे की रकम हड़पकर रामनाथ ने मां सीता देवी को भी सताना शुरू कर दिया है। सीता कहती हैं, “ सरकारी मुआवजे ने हमारी मुश्किलें बढ़ा दी है। नई बीवी के इश्क में बेटा इस कदर पागल हो गया है कि वो अब अपने जिगर के टुकड़ों को भी अपनाने के लिए तैयार नहीं है। दो दिन से भूखी हूं। दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं हो पा रही है।”नरसंहार कांड के बाद उभ्भा गांव के जो आदिवासी हिंसा में मारे गए उनके परिजनों के सामने अब रोटी का संकट नहीं है। लेकिन भारी-भरकम मुआवजे ने जो कुरुप चेहरा दिखाया है, वह इंसानियत को शर्मशार करने वाला है। 
मुआवजे से जुड़ी दिल दहला देने वाली एक कहानी सुखवंती (28) से शुरू होती है। वह उभ्भा गांव के युवक रामनाथ की पत्नी थी। सुखवंती अपने परिवार की जीवन-रेखा मानी जाती थी। खेत में अन्न उगाने से लेकर घर का भोजन बनाने और सास-ससुर व बच्चों के परवरिश की जिम्मेदारी खुद सुखवंती उठाती थी।17 जुलाई 2019 को दबंग भूमाफियाओं ने आदिवासियों की जमीन कब्जाने के लिए अंधाधुंध फायरिंग की तो सबसे ज्यादा गोलियां सुखवंती को लगीं। समूचा शरीर छलनी हो गया। वह मौके पर ही मारी गई। इस हिंसा में सुखवंती के पति रामनाथ के बाएं हाथ में गोली लगी तो सास सीता देवी के दोनों पंजों को गोलियों ने छलनी कर दिया। ससुर तेजा सिंह भी गंभीर रूप से घायल हुए, और बाद में उनकी भी मौत हो गई।नरसंहार के कांड के बाद उभ्भा गांव में सरकार भी आई और कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी भी। योगी सरकार की ओर से मृतक परिवारों को 18-18 लाख मिले तो प्रियंका ने दस-दस लाख दिए। घायलों को आठ-आठ लाख मुआवजा मिला।
सपा नेताओं ने भी आदिवासियों की दिल खोलकर मदद की। नतीजा, उभ्भा गांव का युवक रामनाथ मालामाल हो गया। कुछ ही दिन बाद उसने दूसरी शादी कर ली। नई बीवी आई तो रंग दिखाना शुरू कर दिया। बेटे अनाथ से हो गए और मां सीता देवी नई बहू की जुल्म-ज्यादती की शिकार।सीता काफी उम्र दराज महिला हैं। इनके पंजे में एक गोली अभी तक फंसी हुई है, जिसका दर्द उन्हें सोने नहीं देता। कहती हैं, “मुआवजे के रूप में सरकार ने हमें बहुत पैसा दिया। घर में लाखों रुपये आए, लेकिन बेटा सारी रकम हजम कर गया। हमारा भी मुआवजा अपने पास रख लिया। मैं दिन-रात कराहती रहती हूं। बेटे से कहती हूं कि आपरेशन करके पंजे में फंसी गोली निकलवा दो, लेकिन वह सुनता ही नहीं। हमारे सामने तो भूख से मरने की नौबत आ गई है।”अपना दुखड़ा सुनाते हुए सीता देवी फफक-फककर रोने लगीं। कहा, “कोई यकीन नहीं करेगा। लाखों रुपये मुआवजा मिलने के बावजूद दो दिन से भूखी हूं। बहू खाना नहीं दे रही है। हमारे सिर पर अब तो पति का भी साया नहीं है। जिस बेटे की परवरिश में हमने अपनी सारी उम्र खपा दी, वह परायों की तरह व्यवहार कर रहा है। हमारे नसीब में मुआवजे की जगह अब सिर्फ बेटे-बहू की गालियां हैं। पहली बहू बहुत अच्छी थी। दिन भर मेहनत-मजूरी करने के बावजूद हमारा बहुत ध्यान रखती थी। हमारे हिस्से में अब सिर्फ आंसू हैं। दिन भर रोती रहती हूं।”उभ्भा की सीता देवी की कहानी वाकई दर्दनाक है। मुआवजे से मिली भारी भरकम रकम ऐसा खलनायक बन गई है कि बेटा रामनाथ को अब अपने ही जिगर के टुकड़े (दोनों बच्चे) नहीं सुहा रहे हैं। सीता बताती हैं, “नालायक बेटे ने अपनी दोनों बेटियों-सपना (4 साल) और प्रीता (2 साल) की परवरिश करने से मना कर दिया है। कुछ रोज पहले उसने एक बेटी को गांव के ही एक व्यक्ति को देकर पल्ला झाड़ लिया। दूसरी बेटी को भी वह अपने पास रखने के लिए इच्छुक नहीं है। गांव वालों को बेटे-बहू की हरकत की जानकारी हुई तो पंचायत बैठी। पंचों ने रामनाथ को फटकार लगाई, तब वह अपनी बड़ी बेटी को लेकर घर आया।”सीता देवी के मुताबिक नरसंहार कांड के बाद मिले मुआवजे ने उनकी जिंदगी तबाह कर दी है। कहती हैं, “पहले दो वक्त की रोटी भले ही मुश्किल से मिलती थी, लेकिन अपनो का दर्द नहीं सताता था। जब से सुखवंती की मौत हुई है, हमारा सुख-चैन ही छिन गया है।” सीता देवी के कान में भी दिक्कत है। हिंसा के बाद से ही उन्हें कम सुनने की बीमारी ने घेर लिया है। सीता बताती हैं, “सुखवंती की मौत के बाद 18 बीघा जमीन मिल गई है। धान-गेहूं की अच्छी खेती हो रही है। आर्थिक दिक्कत दूर हो गई है, लेकिन खेत और पैसे ने बेटे का दिमाग खराब कर दिया है।” मां के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर रामनाथ ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया और कहा, मां बूढ़ी हो गई है। वह पागलों की तरह हरकत करती है। वह किसी से कुछ भी कह देती है। उसकी बातों पर कतई यकीन न कीजिएगा।नरसंहार कांड के बाद उभ्भा गांव में इतना विकास पहुंचा है, जिसकी गांव वालों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सबके पक्के घर बन गए। पीने के पानी का संकट दूर हो गया। पक्की सड़क और बिजली का उजाला नरसंहार कांड के बाद विकास की नई कहानी कहता है।दरअसल, यह विकास रामधारी, राजेश, अशोक, प्रभा, सुखवंती, तेजा सिंह, रामचंद्र, जवाहिर, दुर्गावती, केरवा आदि की हिंसा में मौत के बाद उभ्भा गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। जिन आदिवासियों के पेट की अतड़ियां भूख से ऐंठा करती थी, भोजन मिलने के बाद अब वो पेट फूलने लगे हैं। आदिवासियों के पिचके हुए गालों के गड्ढे भर गए हैं। हालांकि अपनों के खोने का गम बहुतों को सता रहा है। हिंसा के बाद गांव में कुछ लोग काफी खुशहाल हो गए हैं तो कुछ महिलाओं की जिंदगी हमेशा के लिए अंधेरे में डूब गई है।
