
बनारस के रविंद्रपुरी के त्रिवेणी सभागार में सजी सुरों की महफिर, भावविभोर हुए श्रोता
वाराणसी। रविंद्रपुरी के त्रिवेणी सभागार में काशी के दिग्गज कलाकारों ने अपनी स्वर लहरियों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। ध्रुव की सारंगी और आदित्यदीप के पखावज ने अद्भुत शमां बांधी। इस मौके पर शहर की जानी-मानी चित्रकार सरिता लखोटिया ने कहा कि संगीत की तरंगें ईश्वर की सांसें हैं। संगीत किसी भी भाव को जागृत कर सकता है या उसका शमन कर सकता है।
रविंद्रपुरी के त्रिवेणी सभागार में शास्त्रीय संगीत के सुरों की महफिल सजी। सुगम संगीत संध्या कार्यक्रम के मौके पर शहर के कई दिग्गज फनकार जुटे और अपनी अदाकारी से श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। बनारस शहर के उदीयमान पखावज कलाकार आदित्य दीप और ध्रुव सहाय की सारंगी की जुगलबंदी बेजोड़ रही। दोनों फनकारों ने चौताल (चार ताल) पर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।
दोनों कलाकारों की जुगलबंदी देर तक चली और श्रोता सुर-सरिता में गोता लगाते रहे।
बाद में डा.रुचि मिश्रा ने राग पुरियाधनाश्री में तीन ताल में निबद्ध रचना मुश्किल करो आसान सुनाया तो लोग वाह-वाह कर उठे। इस मौके पर अलका देव ने नजरुल गीती और डा.मधुच्छंदा दत्ता (ध्रुपत गायिका) ने नयन भरा जल अजलि लाहो मार… सुमधुर गायन प्रस्तुत किया। 
संगीत संध्या के मौके पर चित्रकार सरिता लखोटिया ने कहा कि शास्त्रीय संगीत मानवीय समुदाय के सांस्कृतिक, धार्मिक तानेबाने का अभिन्न अंग रहा है। मनुष्य की भांति संगीत का मूल स्वरूप दैविक है। इसीलिए देवी-देवताओं को कोई वाद्ययंत्र हाथ में लिए चित्रित किया जाता है- कृष्ण भगवान के पास बांसुरी, शिव के साथ डमरू, सरस्वती के हाथों में वीणा आदि।
लखोटिया ने कहा कि संगीत ने कोरोना काल में अनेक लोगों का मन और दिल से टूटने से बचाया है। संगीत को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से सुनते हैं। तभी तो अनायास ही श्रोताओं के हाथ पांव थिरकने लगते हैं और दिलो-दिमाग में सिरहन उठती है। कह सकते हैं संगीत से जिसके पांव और उंगलियां न थिरकें, वह संवेदनशून्य है। उन्होंने कहा कि बनारस की संगीत परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए गीत-संगीत के कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाएंगे। इस मौके पर शहर के गण्यमान्य नागरिक, पत्रकार और शिक्षाविद उपस्थित थे।
