
इस्लाम में मुहर्रम को गम का महीना माना जाता है। मुस्लिम समाज खासकर शिया समुदाय के लोग इस माह के नौवें या दसवें दिन रोजा रखते हैं। मुहर्रम में पैगम्बर हज़रत मोहम्मद के नाती हज़रत इमाम हुसैन समेत कर्बला के 72 शहीदों की शहादत को याद करते हुए मातम मनाया जाता है। इस दिन ताजिया जुलूस निकाल कर या हुसैन की सदाएं दी जाती हैं। इसके बाद उनको कर्बला में दफन किया जाता है।
कर्बला की जंग बादशाह यज़ीद की सेना और हज़रत इमाम हुसैन के बीच लड़ी गई थी। इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने परिवार और दोस्तों के साथ सर्वोच्च कुर्बानी दी थी। उनकी शहादत मुहर्रम के 10वें दिन हुई थी। इस दिन को आशूरा कहा जाता है। उन शहीदों की याद में हर साल ताजिए बनाए जाते हैं और जुलूस निकाले जाते हैं। ये ताजिए उन शहीदों के प्रतीक होते हैं। मातम मनाने के बाद उन ताजिए को कर्बला में दफनाया जाता है। इराक में इमाम हुसैन का मकबरा है।
हुसैन अलैहिस्स्लाम का जन्म 3/4 शाबान हिजरी को पवित्र शहर मदीने में हुआ था। उनके पिता का नाम अली तथा माता का नाम फातिमा ज़हरा था । हुसैन अपने माता पिता की द्वितीय सन्तान थे । इतिहासकार मसूदी ने उल्लेख किया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः वर्ष की आयु तक हज़रत पैगम्बर(स.) के साथ रहे। मुहम्मद साहब को अपने नातियों से बहुत प्यार था । पैगम्बर(स.) साहब ने कहा था कि “हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह तू उससे प्रेम कर जो हुसैन से प्रेम करे।” पैगम्बर(स.) साहब के इस प्रसिद्ध कथन का शिया व सुन्नी दोनो सम्प्रदायों के विद्वानो ने उल्लेख किया है ।
साभार सहयोग : संतोष शर्मा
