लेख : राजीव कुमार सिंह
देश एक बार फिर आजादी के जश्न में सराबोर है ,महामारी के दो चरणो में देश के मौजूदा हालात के पोल खुल गए है , देश के एक – एक नागरिकों ने दूसरों नागरिक को संदेह के नजर से देखा,मौत के तांडव ने एक-एक करके कई अपनों को अपने आगोश में ले लिया ,घरों में मातम का मंजर है फिर हर्ष और उल्लास की अनुभूति कैसे हो ?
पूरे देश की व्यवस्था बेपटरी है,शिक्षा व्यवस्था पटरी पर नही लौट पाई ,कई परिवार भूख से आज भी जंग लड़ रहे है, रोजगार का पता नही ,भविष्य का पता नही ?
आजादी इतने सालों बाद भी हम आज वही खड़े है,लोकतांत्रिक सरकारों के दावे और योजनाओं का प्रसार टीवी और न्यूज पेपर में तो दिखता है लेकिन जमीन पर हकीकत देख के लगता है, शहरों में चौड़ी सड़के,रंग बिरंगे लाइट तो विकास के की गवाही दे रहे है , अंदर खाने में हकीकत पता करो तो पता चलता है कि पूरा विकास ही खोखला है,
आपको याद होगा कोरोना के पहले चरण में 20 लाख करोड़ का पैकेज की भी घोषणा हुई थी वह पैकेज किधर है इसका जवाब भी नही देश को मिल पाया , विपक्ष भी यही कहता है कि सरकार जवाब दे लेकिन सत्ता में लौटते ही सरकार विपक्ष में जब जाती है तो वे नेतृत्व से सवाल पूछते है ।
लेकिन इन सवालों का जवाब में जनता तो बस मूकदर्शक है, बेमतलब के कानूनों का बोझ और भ्रष्टाचार के कोढ़ से मुक्ति जनता को मुश्किल दिखाई देता है ,क्योंकि ये सिस्टम का एक अचूक हिस्सा है ,मंत्रियों ,सांसदों, विधायको की संपत्ति में इजाफा तो हो रहा है लेकिन गरीबों की जेबों में अधेला की भी गुरबत है।
दावे के विपरीत जमीनी हकीकत लेने वालों ने भी सिर्फ कागजी खानापूर्ति किया क्योंकि जाति धर्म से ऊपर भ्रष्टाचार ही अब देश चलाने वालों की पूरी संस्कृति बन गई है।देश की भूमि का चीरहरण करके ये दीमक देश को पूरी तरह से लगभग खोखला कर चुके है ।अराजकता और साम्प्रदायिक विभाजन करके अब समाज को भी वैमनस्यता के दलदल में धकेलने की पूरी तैयारी हो चुकी है, फिर भारतीय संविधान के उद्देश्यों की आत्मा प्रस्तावना में “हम भारत के लोग ” के विषय को कौन मजबूत करेगा ?
आजादी के इतने सालों बाद भी देश को खुशहाली के मार्ग पर ले जाने का जिन लोगों ने जिम्मा लिया था ,आज अन्नदाताओं पर बाजार की संस्कृति थोपने को आतुर है , किसान और नौजवान दोनों सड़क पर है एक देश का पेट भरता है तो दूसरा ताकत देता है ,लेकिन दीमक अब उन्हें भी खाने की तैयारी में है , संसद मौन है तो लड़ाई सड़क पर शुरू हो गई देश मे अघोषित आपातकाल का माहौल बन चुका है, सरकारें रौलट एक्ट के मार्ग पर है ,व्यवस्था पूंजीवाद की गुलामी में जकड़ चुकी है।लेकिन जनता की सुध लेने वालों की दरकार है ।समाजसेवी लक्जरी गाड़ी में है और समाज के मालिक धूल में भविष्य ढूढ रहे है ,
स्वतंत्रता सेनानियों ने तो ऐसी कल्पना कभी की नही रही होगी कि अंग्रेजों के गुलामी से मुक्त देश को भ्रष्टाचार के दीमकों द्वारा भविष्य में खोखला कर दिया जाएगा ।आज हम उसी राह पर है, जहाँ भविष्य की राह दिखाई नही पड़ रही है ,देश ने ऐसे नीति निर्माताओं को नेतृत्व दिया है जिन्हें देश से ज्यादा खुद की फ़िक्र है ।अब आप ही बताइए इस माहौल में कैसे हम जश्न मनाए ।
