विशेष संवाददाता
वाराणसी । “लड़ो पढ़ाई करने को-पढ़ो समाज बदलने को।” यह फकत नारा नहीं, जुनून है- प्रज्ञा सिंह का। मिर्जापुर के एक गांव में मामूली परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी प्रज्ञा सिंह अब एक ऐसी शमा जला रही हैं जिसकी लौ से कुपोषण, गरीबी, बेरोजगारी, महिलाओं की अशिक्षा और मानवाधिकार हनन रफ्ता-रफ्ता मिटने लगा है। प्रज्ञा बनारस के बीएचयू में इकोनामिक्स में शोध की तैयारी कर रही हैं। वह पिछले पांच-छह सालों से समाज के अंतिम आदमी की बदरंग जिंदगी में खुशिहाली की शमा जला रही हैं। इरादे नेक हैं, इसलिए कामयाबी भी मिल रही है।
लाकडाउन में बदरंग गरीबों की जिंदगी को संवारने में जुटी प्रज्ञा किसी एनजीओ की मेंबर नहीं हैं। इनके कदम कभी गरीब बुनकरों, बदहाल लोगों और भीख मांगने वाले लोगों की झुग्गियों में पहुंच जाते हैं तो कभी भोजन के लिए मोहताज सेक्स वर्कर्स के घरों में। ये अपनी पाकेटमनी से गरीब घरों की बेटियों के अलावा अशक्त महिलाओं की मदद कर रही हैं। जिन मलिन बस्तियों की बेटियां क..ख…ग…घ… नहीं जानती थे उन्हें प्रज्ञा ने पढ़ाया और अंग्रेजी के जुमले तक बोलने सिखा दिए।
प्रज्ञा सिंह के दिल में बनारस की गरीब, निरक्षर महिलाओं और बच्चों के लिए हर वक्त खदबदाहट मची रहती हैं। दरअसल प्रज्ञा सिंह का दिल मानवता के लिए धड़कता है। वह जब-तब काशी में इंसानियत की ऐसी आधारशिला रख जाती हैं जिसकी मिसाल बनारस में कहीं देखने को नहीं मिलती। हाल में उन्होंने बदहाल सेक्स वर्कर्स के घरों में जाकर उनके लिए राशन-भोजन की व्यवस्था कराई तो तमाम गरीबों का दर्द भी साझा किया।
प्रज्ञा सिंह का अपना एक जुनून है। सच को सच कहने का हिम्मत और हौसला रखती हैं। इनका लक्ष्य हिमालय की तरह ऊंचा है। बनारस का अस्सी मुहल्ला रहा हो या सामने घाट की मलिन बस्तियां या फिर शहर की वो दलित बस्तियां जहां पहुंचते ही लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। प्रज्ञा सिंह अपनी दोस्तों के साथ जाकर वहां मजलूमों की सेवा करती हैं। खासतौर पर उन मजलूमों की जिनकी चिंता न तो सरकार को है, न ही सुनहरे भविष्य का ख्वाब दिखाकर वोट हासिल करने वाले नेताओं को।
प्रज्ञा सिंह और इनकी दोस्तों ने की मदद से सैकड़ों बेटियों में शिक्षा की नई ललक जगी है। गरीब घरों की तमाम लड़कियां इनके प्रोत्साहन के चलते स्कूल-कालेजों में जाकर पढ़ने लगी हैं। इन्होंने यहां शिक्षा ही नहीं, प्रेरणा-आदर्श की ऐसी सशक्त मिसाल पेश की है जिससे मलिन बस्ती की तमाम बेटियां मलाला की तरह अपने देश का नाम रौशन करने का इरादा रखती हैं। ये बेटियां उन लोगों की हैं जिन्हें इलाके के लोग पहले शराबी और नशेड़ी के रूप में जानते थे।
प्रज्ञा सिंह कहती हैं, जब तक अशिक्षित महिलाओं की शिक्षा और अमानवीयता के खिलाफ जंग में हमारी जीत नहीं हो जाती तब तक हमारी मुहिम जारी रहेगी। वह अपना प्रचार नहीं चाहतीं। कहती हैं, गरीबों, दिव्यांगों और अशिक्षित महिलाओं का मुद्दा चर्चा का नहीं, आचरण का विषय है। इन मुद्दों पर बहस और चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन जरूरतमंदों को फायदा पहुंचाने की बात आती है तो लच्छेदार बात करने वाले भाग खड़े होते हैं। मानवाधिकार के सबसे बड़े दुश्मन वे लोग हैं जो सिर्फ ढोल पीटते हैं। गरीबों के श्रम और संपदा का शोषण करते हैं। देशों की प्राकृतिक संपदा पर नजरें गड़ाए रहते हैं। पूंजी अपने आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में बुराई है। आज दुनिया में सिर्फ खुद को बेहतर दिखाने और बर्चस्व की जंग मची है। शिक्षा और मानवाधिकार सभी के लिए समान होता है, लेकिन वास्तव में इसका फायदा उसे ही मिल पाता है जिसे या तो इसकी जाकारी हो या कोई संसाधन।
सुश्री प्रज्ञा मानती हैं कि भारत में महिलाओं को अधिकार उनकी हैसियत देखकर मिलता है। वह इसे गलत और शर्मनाक मानती हैं। कहती हैं कि महिलाओं के अधिकार का हनन उन्हीं इलाकों में अधिक होता है जहां साक्षरता का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। इसी लिए वह बेटियों को शिक्षित करने और असहाय महिलाओं को अत्मनिर्भर बनाने में जुटी हैं। प्रज्ञा मानना है कि जीवन में हर चीज बैलेंस में होना चाहिए। गरीबी-अमीरी का फर्क तो मिटना ही चाहिए।
