
वाराणसी । समाज के प्रति सम्यक दृष्टि और निष्ठा के साथ यदि समाज मे दार्शनिक विचार धारा के साथ नेतृत्व की धारा बनाकर नई पीढ़ी को इसका दायित्व दिया जाय तो आने वाले समय मे समाज अपनी भागीदारी से वंचित नही रह सकता है ।यह वक्तव्य अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विजय विनीत ने एक वार्ता के दौरान कहा ।उन्होंने आगे कहा कि आम तौर पर मैं वंचित तबकों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक,शैक्षणिक,प्रतिनिधित्व पर ज्यादा बात करना पसंद करता हूं,इसके साथ ही साथ युवा पीढ़ी की उपरोक्त विषयों पर भागीदारी को लेकर भी विभिन्न मंचो से सवाल खड़ा करने की कोशिश करता हूं लेकिन कुछ राजनेताओं की राजनीतिक महत्वकांक्षा उनको अपने सही पथ पर जाने देने में बाधा उत्पन्न करती है ,हमें उन विषयों और उन शिकायतों को भी नोट करना चाहिए जो वास्तव में समाज की जरुरत है,केवल नेता के पीछे चल देने से हम मनुष्यों की गणना भेड़ चाल से ऊपर नही आ पाएगी,हमारी चिंता उनके लिए नही है जो राजनीति में खुद को स्थापित कर चुके है,बल्कि चिंता इस बात की है विगत इतने सालों बाद भी वंचित तबके के नेता देश के केंद्रविंदु से क्यों दूर है ? जब कि जनसंख्या आंकड़े में भी ये सबसे ऊपर है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि राजनीति का मार्ग लोकतंत्र के बजाय नोटतंत्र की ओर रुख करती है,अब हालात यहाँ तक आ चुके है कि लोकतंत्र ,नोटतंत्र से आके चलकर लूटतंत्र में बदल गया है,फिर भी विपक्ष केवल संख्या की बात करके यदि सरकार को सवालों से नही घेरता है तो फिर यह सवाल या इशारा विपक्ष पर भी हो सकता है ।डॉ लोहिया के उस विचार को कोट करते हुए कहते है कि जब सड़के सुनी हो जाती है तो संसद आवारा हो जाती है ,आज के हालात को देखकर तो यही महसूस हो रहा है कि सच मे सड़के सुनी और संसद आवारा हो चुकी है । मायावती के नोट के माला पहनाने के सफ़र पर उन्होंने कहा कि मेरा अंतर्मन इस प्रतिरोध में हो गया कि क्या अब विचारों की नही बल्कि नोट तंत्र की राजनीति की जरूरत है ? क्योंकि हमें नोट से ज्यादा समाज के उस तबके की चिंता है जो सोनभद्र के आदिवासी इलाके से चिलचिलाती धूप में रमाबाई अम्बेडकर पार्क में मायावती में आस्था रखते हुए बच्चे,बूढ़े भीड़ भरी रैली में हाथों में टूटे चप्पल लिए अपने नेता को सुनने के लिए गर्म धरती पर नंगे पैर दौड़ कर आते रहे है,उस समय बसपा में नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य,रामचल राजभर, दद्दू प्रसाद सहित कई नेताओँ की मायावती की पूरी टोली में तूती बोलती थी ।मुझे यह भी मालूम है कि मायावती के सबसे करीबी और विश्वसनीय बाबू सिंह कुशवाहा के साथ सतीश चंद्र मिश्रा,अनन्त मिश्रा, नसीमुद्दीन, सुखदेव राजभर आदि द्वारा साजिशन कई आपराधिक मामले में उलझाया गया और उन्हें जेल जाना पड़ा ।आज जिस जन अधिकार पार्टी के नेता अपने हक से इस पार्टी की लोकप्रियता का गुणगान कर रहे है,यदि समाज के लिए न्याय,हक,राष्ट्रीय एवं सामाजिक गतिरोध को ध्यान में रखते हुए समाज के वंचित तबकों के प्रतिनिधत्व ,सामाजिक, राजनीतिक,शैक्षणिक,मीडिया, न्याय प्रणाली, संवैधानिक प्रणाली, खेती और खलिहानी के विषय पर खुले मन से अपनी बात रखते तो इतना जरूर होता कि कम से कम समाज जागरूक होता और एक दूसरे की कड़ियों को जोड़ने में सफल होता और एक किसी नेता को मानकर चल पड़ता ।बाबू सिंह कुशवाहा आज भले सवालों के घेरे में है,लेकिन उन्होंने वंचित तबके के हर व्यक्ति को उनकी भागीदारी का एहसास कराया,लेकिन चन्द चाटुकारों की वजह से वे हमेशा साजिश का शिकार बनते गए ।
मौजूदा हाल यह कि हमारे समाज और वर्ग के नेता भले ही शीर्ष पद पर हो लेकिन उनकी हालत भारत के प्रथम नागरिक रामनाथ कोविंद से कम नही आंकी जा सकती है ।समाज पर कितना ही आफत आ जाये,बवाल हो जाये मगर वे अपने राष्ट्रीय संबोधन में सैलरी और इनकम टैक्स से आगे नही सोचते है ।कुछ ऐसा ही हाल वंचित तबकों के नेताओं में भी है,उन्हें पद पैसे का लालच दे दीजिए फिर समाज का गला घोंटने के लिए भी वे तैयार हो जाते है,क्योंकि उनकी आर्थिक सेहत की बुनियाद पद और पैसे से आगे की सोच पर नही बन पाती ।जिन्होंने पहले से समाज का शोषण करके लगातार घी पिया है उन्हें आजकल के युवा वोट से आगे नजर नही आते ।
* कुछ सवाल :
1- नीट पर सरकार ने पिछड़ो के आरक्षण को पूरी तरह से समाप्त कर दिया इसपर स्वस्थ बहस होनी चाहिए कि नही ?
2-जो लोग सत्ता या विपक्ष में है,उनका नई पीढ़ी के प्रति क्या नजरिया है ,उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए आवाज उठाया जा सकता है कि नही ?
3- बिना जातिगत जनगणना के 10 प्रतिशत संवर्ण आरक्षण देने का मानक क्या था , इस पर सवाल कौन पूछेगा ,जवाब कौन देगा ?
4- जब सार्वजनिक क्षेत्रों से पूरे देश का नियंत्रण खत्म करके ,वंचित तबकों के पेट पर लात मारा जा रहा है,इस विषय पर किसकी जवाबदेही होनी चाहिए ?
5- मीडिया और ज्यूडिशियरी सेक्शन में वंचित तबकों का प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाया जाय, उनको संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत किस श्रेणी में स्थान दिया जाय उसपर बहस होनी चाहिये कि नही ?
6- समाज का कोई भी व्यक्ति जब इंसाफ पाने में कमजोर पड़ रहा है,तो उस समय हमारा क्या दायित्व होना चाहिए ?
7- लैटरल इंट्री (चोर दरवाजा) से बिना लिखित परीक्षा के मात्र इंटरव्यू के आधार पर सिविल सेवक चुन लिए जाते है,और वंचित तबके के प्रतियोगी के हक पर दिनदहाड़े डाका डाल कर पूरे देश के वंचित और कमजोर समाज के हक पर अतिक्रमण कर लिया जाता है,क्या इस पर स्वस्थ बहस की जरूरत नही थी ?
8- क्या हमारा समाज हर वक्त नेताओं के मोहित करने की वाणी के आगे मुग्ध होकर अपने भविष्य के ढांचे को खत्म करना चाहता है ?
9- क्या समाज एक बार फिर खुद को छले जाने के लिए तैयार है ?
10- क्या हम अपनी कब्रो-चिताओं पर नेताओं को अपनी पद और लालसा के सपनों को तांडव करते हुए नष्ट करने का भरपूर मौका देने के लिए तैयार है ?
11- क्या धन और रसूख के आगे उन लोगो की समाज मे कोई अहमियत नही है,जो वास्तव मे अपने समाज के लिए ईमानदारी से हक और उनके अधिकार के लिए लड़ वास्तव में लड़ बिना किसी मंच के लड़ रहे है ।12- क्या इन लड़ने वालों के लिए दिए गए मंच को आसानी से छीन लेना यह समाज के हित मे आता है ।
सनद रहे समाज को चाटुकार एवं लोभी नेताओं से उतना ही खतरा है,जितना आपके विरोधियों से है,क्योंकि यह समाज की दिशा ,दिशा और भविष्य पर मंथन से रोकते है ताकि उनका अंध जलवा बरकरार रहे है।समाज के उन हितैषी लोगों को भी एक निम्न कलमकार और राजनीतिक समझ की हैसियत से जानता हू, जो समाज को ही निचले पायदान पर धक्का देने के लिए चंद पैसे लेकर बिक जाते है,और दोष समाज का देते है कि समाज ने साथ ही नही दिया ।आखिर ये खेल कब तक चलेगा,कब तक हम युवाओं के भविष्य की सौदेबाजी होगी ? सार्वजनिक क्षेत्रों के निम्नीकरण से आज देश की 85 प्रतिशत हिस्से की आबादी सड़क पर खाली पेट सोने के लिए तैयार की जा रही है ।क्या हम इनकी चिंता कर पा रहे है ? नेता और समर्थक से ज्यादा अनुयायी बने रहने की परम्परा समाज की आने वाली पीढ़ी के लिए घातक है ,इसलिए मानसिक ग़ुलामी से ऊपर उठकर आत्ममंथन कीजिये क्या सच मे हम समाज के साथ न्याय कर रहे है,या उनको भविष्य में सुरक्षा प्रदान कर पा रहे है ।यदि कार्यकर्ता अपने नेता के लिए अपना खून बहाने के लिए तैयार है तो फिर नेता कार्यकर्ता के लिए अपना खून क्यों नही बहा सकता ? चाटुकार नही समझदार बनिये और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करवाइये,क्योंकि जो आलोचना सुनने की साहस रख सकता है वही समाज के लिए कुछ कर सकता है ।अन्यथा समाज के साथ ये ठग हारी के खेल ज्यादा टिकाऊ नही हो सकता है ।
#अंधभक्ती नही बल्कि आत्मचिंतन कीजिए एव स्वतंत्र फ़ैसला लीजिये कि आपको वास्तव में क्या चाहिए ?
